Tuesday, August 11, 2026
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सुप्रीम कोर्ट का बिहार में एसआईआर पर रोक लगाने से इंकार, चुनाव आयोग को भी सलाह-तीन दस्तावेजों को दें मान्यता

नई दिल्ली। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर दाखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है, जिससे चुनाव आयोग को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं में लोकतंत्र और नागरिकों के मतदान अधिकार से जुड़ा गंभीर मुद्दा उठाया गया है, जिस पर विस्तृत सुनवाई की जरूरत है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को सुझाव दिया कि वह आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड जैसे तीन प्रमुख दस्तावेजों को मतदाता की पहचान के लिए स्वीकार करने पर विचार करे। कोर्ट ने कहा कि आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेजों की संख्या को सीमित करने से आम नागरिकों को सुविधा होगी।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि नागरिकता का निर्धारण केंद्र सरकार करती है, न कि कोई बूथ लेवल ऑफिसर। अगर चुनाव आयोग मतदाता की नागरिकता तय करेगा, तो यह संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग का 24 जून का आदेश संविधान और कानून के अनुरूप नहीं है।वहीं, चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने बताया कि 2003 में भी इसी तरह की इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया अपनाई गई थी, और वर्तमान में भी पूरी पारदर्शिता के साथ वही प्रक्रिया दोहराई जा रही है। आयोग ने बताया कि उसने मतदाता सत्यापन के लिए 11 दस्तावेजों को मान्यता दी है, और नागरिकता तय करना उसका उद्देश्य नहीं, बल्कि मतदाता की पहचान सुनिश्चित करना है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एसआईआर प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई जाएगी, लेकिन सभी पक्षों को 28 जुलाई तक विस्तृत जवाब दाखिल करने होंगे। इसके बाद इस मामले में आगे की सुनवाई होगी।यहां मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण में नागरिकता के मुद्दे को क्यों उठाया जा रहा है। यह गृह मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र है। कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण में दस्तावेजों की सूची में आधार कार्ड पर विचार न करने को लेकर निर्वाचन आयोग से सवाल पूछा। वहीं एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की अनुमति दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि समग्र एसआईआर के तहत करीब 7.9 करोड़ नागरिक आएंगे और यहां तक कि मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड पर भी विचार नहीं किया जा रहा है। इस बात को लेकर चिंता जाहिर की जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले के संबंध में 10 से ज्यादा याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें प्रमुख याचिकाकर्ता गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ है।बता दें राजद सांसद मनोज झा और टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के अलावा कांग्रेस के सी वेणुगोपाल, शरद पवार नीत राकांपा गुट से सुप्रिया सुले, भाकपा से डी राजा, समाजवादी पार्टी से हरिंदर सिंह मलिक, शिवसेना (यूबीटी) से अरविंद सावंत, झारखंड मुक्ति मोर्चा से सरफराज अहमद और भाकपा (माले) के दीपांकर भट्टाचार्य ने संयुक्त रूप से अदालत का रुख किया है। सभी नेताओं ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के निर्वाचन आयोग के आदेश को चुनौती दी है और इसे रद्द करने की मांग की है।

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