Wednesday, October 7, 2026
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बदले न्यायिक सेवा में प्रवेश के नियम

नई दिल्ली। न्यायिक सेवा में प्रवेश की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बदलाव किया है। कोर्ट ने निचली अदालतों में जज बनने के लिए वकालत की प्रैक्टिस को अनिवार्य रखने के अपने फैसले को बरकरार रखा है, लेकिन न्यूनतम प्रैक्टिस की अवधि तीन साल से घटाकर एक साल कर दी है। इसके साथ ही चयनित उम्मीदवारों के लिए कठोर प्रशिक्षण की व्यवस्था भी तय की गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों के पास अदालत की कार्यप्रणाली और वकालत का व्यावहारिक अनुभव होना जरूरी है। हालांकि, तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस की शर्त से कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले प्रतिभाशाली युवाओं के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता लंबा हो रहा था।

इसी को ध्यान में रखते हुए अवधि घटाई गई है। सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश के अनुसार न्यायिक सेवा परीक्षा में सफल उम्मीदवारों को नियुक्ति से पहले एक साल का गहन प्रशिक्षण लेना होगा। यह प्रशिक्षण राज्य की न्यायिक अकादमी में दिया जाएगा। इसके बाद उम्मीदवारों को कुल एक साल की क्लर्कशिप भी करनी होगी। इसमें छह महीने जिला जज या उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारी के साथ और अगले छह महीने हाईकोर्ट के मौजूदा जज के साथ काम करना होगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य नए न्यायिक अधिकारियों को अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली, मामलों की सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया का व्यावहारिक अनुभव देना है।

तीन साल की जगह अब एक साल की प्रैक्टिस – मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रवेश स्तर के न्यायिक पदों के लिए वकील के तौर पर कम से कम तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य की थी। इस फैसले के खिलाफ कई समीक्षा याचिकाएं दाखिल की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अब अपने रुख में संशोधन करते हुए प्रैक्टिस की न्यूनतम अवधि एक साल कर दी है। यानी कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उम्मीदवार को कम से कम एक साल अदालत में सक्रिय वकालत का अनुभव हासिल करना होगा। इसके बाद वह न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए पात्र होगा।

31 मार्च 2027 तक संक्रमणकालीन राहत – कोर्ट ने उन उम्मीदवारों को भी राहत दी है जो तीन साल की प्रैक्टिस की पुरानी शर्त के कारण असमंजस में थे। संक्रमण अवधि के तौर पर यह व्यवस्था 31 मार्च 2027 तक लागू रहेगी। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे कानून स्नातक जिन्होंने समीक्षा के तहत फैसले के बाद एक साल से अधिक समय पूरा कर लिया है, उन्हें आवेदन के लिए एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस पूरी करने वाला माना जाएगा। इस अवधि के लिए उन्हें अलग से प्रैक्टिस प्रमाणपत्र देने की आवश्यकता नहीं होगी।

महिला उम्मीदवारों पर भी जताई चिंता – सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तीन साल की प्रैक्टिस की अनिवार्यता के संभावित प्रभावों पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद लंबी अवधि तक प्रैक्टिस की शर्त प्रतिभाशाली युवाओं को न्यायिक सेवा को करियर के रूप में चुनने से हतोत्साहित कर सकती है। महिला उम्मीदवारों की परिस्थितियों का भी अदालत ने विशेष रूप से उल्लेख किया। परिवार और सामाजिक दबाव, विवाह तथा स्थान परिवर्तन जैसी परिस्थितियों के कारण कई महिला उम्मीदवारों के लिए लगातार कई वर्षों तक प्रैक्टिस करना मुश्किल हो सकता है।

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